मांदर केवल झारखंड का वाद्य यंत्र नहीं, बल्कि राज्य की लोक-संस्कृति की पहचान है………………………
रिपोर्ट रांची डेस्क…..……
अखरा से जीआई रजिस्ट्री तक पहुंचा मांदर, 2021 से चल रही थी प्रक्रिया
झारखंड के आदिवासी लोकजीवन, पर्व-त्योहार और अखरा से जुड़े मांदर को जियोग्राफिकल इंडिकेशन (जीआई) टैग मिल गया है। भारत सरकार की जीआई रजिस्ट्री, चेन्नई ने इसे भौगोलिक संकेतक का दर्जा दिया है। पारंपरिक लाल और नगड़ा मिट्टी से तैयार इस लोकवाद्य को अब कानूनी और भौगोलिक पहचान मिल गई है।
मांदर को जीआई टैग दिलाने की प्रक्रिया 2021 से चल रही थी। दूसरे राज्यों में इससे मिलते-जुलते वाद्ययंत्र होने के कारण पंजीकरण की प्रक्रिया लंबित थी। अब इसे झारखंड के मांदर के रूप में पंजीकृत किया गया है। मांदर का संबंध झारखंड के लोकगीतों, जनजातीय नृत्यों और सामुदायिक जीवन से लंबे समय से रहा है।खास तौर पर गुमला के रायडीह क्षेत्र में मांदर निर्माण की पारंपरिक कला महत्वपूर्ण है। इसके निर्माण में स्थानीय मिट्टी, चमड़ा और पारंपरिक तकनीकों का इस्तेमाल होता है। मांदर की थाप झारखंड के करमा, सरहुल, झूमर और अन्य लोकनृत्यों में लय प्रदान करती है और राष्ट्रीय स्तर के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भी इसकी प्रस्तुतियां हुई हैं।‘मांदर सम्राट’ मनपूरन नायक ने कहा-मांदर केवल एक वाद्य नहीं, झारखंड की सांस्कृतिक धरोहर है। इसके बिना अखरा पूरी तरह सूना है। राज्य के 43 पारंपरिक वाद्यों में मांदर को सर्वोपरि माना गया है। विशेषज्ञ और एनयूएसआरएल के विजिटिंग फैकल्टी डॉ. सत्यदीप सिंह ने आवेदन से लेकर अंतिम पैरवी तक मुख्य भूमिका निभाई।

